Sunday, April 22, 2012

साकी

भरे हुए पैमाने को, इस कदर बेरहमी से ठुकराया है 
साकी, ये कैसा दिन तूने आज हमें दिखलाया है 

इसी पैमानेसे छलकते थें कभी दोस्ती के वो सूर भी, 
तो फिर आज दुश्मनोंसा काम तुझे क्यूं रास आया है? 

दुनिया की बातें होती थी तुझ से जाम-ब-कफ अक्सर 
 आज उसी दुनिया के डर में बज्म से तू उठ आया है 

हमसफर भी था तू मेरा साकी, और हमसफीर भी
 इन सूनी राहोंमें हमने, आज खुद को अकेला पाया है

 आ लौटकर मैफिल में, मेरे हमराज, मेरे मूनिस
 तू है तो ये जाम है, वरना तो गम का साया है 


अर्थ  -
जाम-ब-कफ - मद्द्याचा प्याला हातात घेऊन 
बज्म - मेहेफिल 
हमसफीर - बरोबर गाणारा मित्र 
मूनिस - मित्र

1 comment:

avanti kulkarni said...

तुम आये हो न शब-ए-इन्तज़ार गुज़री है
तलाश में है सहर बार बार गुज़री है|


न गुल खिले हैं, न उनसे मिले, न मय पी है
अजीब रंग में अब के बहार गुज़री है|