Friday, September 30, 2011

मितवा


कैसी हो? आशा करता हूँ की जैसी पहले थी, वैसी ही हो. एक तुम ही तो हो जो इस बदलती दुनीया में बदलती नहीं. वरना आजकल तो आईने में खुदको देखकर चौंकना भी नयी बात कहाँ रही हैं?

मितवा, कभी कभी सोचता हूँ, पता नहीं कबसे और किस चीज के पीछे (या किस चीज से दूर ?) भाग रहा हूँ. कितने साल हो गये. आजकल तो लगता हैं की सिर्फ़ कुछ गिने चुने लोग ही मेरे अपने हैं. किसी जगह को अपना कहने का सौभाग्य मेरे नसीब में कहाँ! किसी मुकाम पे अगर ठहर भी गया तो वहांपे, गुजरे मकामोंकी यादोंमें नोस्टॅल्जिक होते होते फ़िरसे सफ़र पे निकल पडता हूँ. और अब तो अगले कुछ साल मेरा काम ही सफ़र (अंग्रेजीमें भी!) करने का होगा. शायद अपनी किस्मत में ही भागंभाग लिखी हैं. इक्कीसबी सदीके बंजारे हो गये हैं हम!

इस भागादौडी का बस एक फ़ायदा है. याददाश्त कमजोर हो जाती हैं (और मेरी तो पहले से ही कमजोर हैं). कडवी यादें और झूटी कामियाबियाँ, धीरे धीरे  जेहेन से छूंटसी जाती हैं. बस हर दिन खुद को नये सिर्हे से देखता हूँ, समझता हूँ. पर कभी कभी ये साली जिंदगी भी अपना मजाक उडा लेती हैं. कलियां मांगी थी या कांटे ये तो याद रहा नहीं. पर काटोंसी हार दिखती हैं बस! कुछ चंद गिनी चुनी ख्वाहिशें तो कम से कम पूरी हों ऎसा सोचा था. पर सिर्फ़ दम निकलेगा ये नही सोचा था! कम्बख्त ये चीज ही ऎसी हैं. दूसरे को परखना तो दूर की बात हैं, पहले खुद को समझना ही सबसे बडी तकलीफ़ हैं. और जिंदगी के इतने सारे बिखरे टुकडोंमेसे मैं खुदको कैसे पहचानूँ? उसमेसे कौनसी सच्चाई मेरी अपनी हैं? और कौनसी किसी और की परछाई?  ’मै क्या हूँ?’ इस सवाल से बचते, छुपते यहांतक तो आ गया. मगर अब लगता हैं, उस अंतरिम दानव का सामना करनेके सिवा कुछ चारा रहा नही.

मुझे गलत मत समझो. मै खुश हूँ. और अब तो कुछ नया होने जा रहा है जिंदगीमें. खुशी तो बहोत हैं. बस कभी कभी दिखा नही पाता. पता हैं, बडबोला हूँ. मगर ऐसे कुछ मामलोंमें चुप रहना ही पसंद करता हूँ. सबकुछ बोलकर नहीं कहा जाता, ये तुमसे ही तो सीखा है. याद हैं वो तुम्हारी पलक के किनारेपे आके ठहरा हुवा आँसू? उसके बाद तो कुछ कहने सुनने की जरूरत ही नहीं पडी!

मितवा, बस आज भी, फ़िरसे एक बार, बिना कुछ कहे.. सुने.. मुझें समझ लों!

1 comment:

avanti said...

mitawa vachun mala kahi oli aathavalya...tya lihitey ithe...


हर घडी खुद से उलझना है मुक्कद्दर मेरा

मैं हूं कश्ती मुझी में है समंदर मेरा…

एक से हो गये मौसम हों कि चेहरे सारे

मेरी आंखों से कहीं खो गया मंज़र मेरा..

किससे पूछूं कि कहां गुम हूं कई बरसों से

हर जगह ढूंढता फिरता है मुझे घर मेरा...