Tuesday, August 18, 2009

कुछ दिन पहलें बस में देखा था उसे
अनजानोंकी भीड में
लगा कोई जाना पहचाना सा आ गया हैं

अपनी सी लगी थी वो भीड मुझें

बससें उतरनेके बाद बहोत देरतक
तॉंकता रहा मैं उसे
नजरोंसे ओझल होनेतक

लगा सपना था कोई, आया सताया चला गया

आज फ़िरसे मुलाकात हुई उससे
ना वो दूरी थी
नाही वो अपनापन

शायद कुछ सपने सपनोंमेंही अच्छे लगते हैं...

Sunday, August 2, 2009

चाँद, रात और कुछ बेवजह बांतें

चाँद को घूर रही थी
रातभर इक नन्ही लडकी
रो रो कर लाल थी आंखें
फ़िर भी नजर नहीं हटाई

पास की सोसाईटीमें टीवी पर
बजते गानेको सुनकर
थम गये उसके आँसू
पर पलक नही झपकाई

देखते देखते चाँदको
नींद से वो घिर गई
फ़ूटपाथ था उसका बिस्तर
और ओढी फ़टी रजाई

रात को आई एक परी
जो हैरान थी बेचारी
चाँद की ऎसी चाहत
इस नन्ही जां ने जताई?

रखा उसने चाँद को
लडकीके सिर के बाजू
सिर्फ़ एक ख्वाहिश का वादा
वो पूरी कर लौट गई

सुबह जब आंख खुली, देखी
एक सफ़ेद गोल सी चीज
हाथ में ली लडकीने
और बडे चांव से चबाई

ना स्वाद था उसे ना खुशबू
ना जवार था वो ना गेहूं
था एक हिरन का चित्र
और सूरज की परछाई

गटर में फ़ेंका चाँद उसने
दी खाली पेट दुहाई
बोली क्या करूं मै चांद का
उसने कब है भूख मिटाई?

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गुलजार साहब की इस त्रिवेणी से प्रेरीत

मां ने जिस चांद सी दुल्हन की दुआ दी थी मुझे

आज की रात वह फ़ुटपाथ से देखा मैंने

रात भर रोटी नज़र आया है वो चांद मुझे